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डॉ मंजुलता सिंह

Saturday, April 25, 2009

युवामन - वृद्धतन

किसी अज्ञात भय से / मेरा बुढापा नहीं डरता हैं
दुसरो के सुख का संकल्प लिये / आज भी दौड़ता फिरता हैं
शरीर भले ही आयु से बंध जाए
मन तो सदैव स्वतंत्र चलता हैं ।
मै नहीं मानती मेरा बचपन खो गया कहीं
वह तो आज भी / ममता की झोली में
अबोध बच्चो की तुतली बोली में
उत्सुक चंचल आँखों में
झांकता हैं , स्वर्ग सुख मांगता हैं ।
मै नहीं मानती मेरी युवावस्था बीत गयी
वह तो आज भी युवा मित्रो के साहस मे
चहकती हैं , फूलो सी महकती हैं
मेरा वृद्ध तन युवा हो जाता हैं
जब किसी युवा साथी का हाथ
हाथ मे मदद को आता हैं ।
बुढापा कोई पड़ाव नहीं
प्रक्रिया हैं आगे बढ़ने की
जो नहीं कर सके अब तक
उसे पूरा करने की ।
भूत - भविष्य की चिंता छोडो
केवल वर्तमान से नाता जोडो ।
यही सच हैं बाकी सब बेमानी हैं ।
बुढापा अभिशाप नहीं
इश्वर की मेहरबानी हैं

Wednesday, April 15, 2009

विनम्र श्रद्धांजलि --- श्री विष्णु प्रभाकर

इस आलेख को इंक ब्लोगिंग के द्वारा लिखा गया हैं । प्रष्ट बड़ा करने के लिये क्लिक करे । कुछ अनछुए पहलु हैं।


Sunday, March 29, 2009

प्रेम - व्यापार

देव हो या दानव

वासना का समुद्र

जब - जब उफनता हैं

सयम का कगार टूट जाता हैं ।

सुंदर प्रकाशवान मछली

सम्मोहन के जाल मै

स्वयं फँस जाती हैं ।

तामसी - वृत्तियाँ

प्यार के अनछुये आकाश पर

काले बादल बन छा जाती हैं ।

चारो और फैले

तामसी कोहरे के भीतर

बलात्कार होता हैं

चीखे उभरती हैं

पर

सत्यवती को बचाने वाला

कोई नहीं आता ।

चीखे मौन हो जाती हैं

वासना तृप्त

चलता रहता हैं

संसार का प्रेम - व्यापार

Thursday, September 25, 2008

सत्ता के भूखे

हे द्रोणाचार्य !
अपने इन शिष्यों को
मत सिखाओ धनुर्विद्या
कही ऐसा ना हो
ये तुम्हारे ऊपर ही
बाण छोड़ दे
तुम्हारे ये शिष्य
शिक्षा के नही
सत्ता के भूखे हैं
सत्ता के लोभ मे
तुम्हारा रक्त भी बहा देंगे
हे द्रोणाचार्य !
अब कोई शिष्य एकलव्य नहीं होता

Tuesday, July 22, 2008

बरसात

मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” भाग 2

मे सम्मिलित मेरी कविता का मै यहाँ दुबारा प्रकाशित कर रही हूँ । आप सब से निवेदन हैं ऊपर दिये लिंक पर जा कर सब सम्मिलित कवियों का प्रयास जरुर देखे

कैसे भूलूँ वे बरसातें
कैसे भूलूँ तुम्हारी बांतें ।

जब सावन को हम तुम तरसे
तब नैनो से मेघा बरसे
कैसे भूलूँ तुम्हारी यादें

कैसे भूलूँ वे बरसातें

उठा बवंडर धरती प्यासी
मेघा तुम फिर भी ना बरसे

कैसे भूलूँ तुम्हारी बांतें ।
कैसे भूलूँ वे बरसातें

Thursday, July 17, 2008

अपना घर

एक घर मे लेती हैं जनम
मानी जाती हैं
धरोहर किसी दूसरे घर की
जाती हैं दुसरे घर
शिक्षाओ कर्तव्यो मे जकडी हुई
दूसरी का वंश बढ़ाने के लिये ।
पति और बच्चो के बीच
बनती हैं सीढ़ी
एक चढ़ता हैं , दूसरा उतरता हैं
पर सीढ़ी हट नहीं सकती ।
कर्तव्य बोध मे बंधकर
अस्तित्व के लिये छटपटाती हैं ।
जिस घर मे जनम लिया
ना वह अपना
जिस घर मे आयी
न वह अपना ।
कर्तव्य की बेडियाँ
अस्तित्व से टकराती हैं
भड़क उठती हैं ज्वाला
कहीं किसी कलम से
निकलेगे जब चिंगारियों के शब्द
तभी नारी रख पायेगी
अपने घर की नींव
तभी बचा पाएगी
अपना घर , उसका अपना घर ।

Monday, July 7, 2008

गर्भपात


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Friday, July 4, 2008

अविवाहित बेटियाँ

माँ का सपना होता हैं
उस दिन से
जब वह बेटी को जनम देती हैं ।
उसकी प्यारी गुड़िया
सजे , संवरे , बड़े होकर दुलहन बने
उसके घर बारात आए
और उसकी बेटी रानी बन कर बाबुल का घर छोडे ।
पर हर माँ का सपना पूरा नहीं होता
आज योग्य बेटियाँ
विवाह - बंधन मे बंधना नहीं चाहती ।
विवाह संस्था मे उनका विशवास नहीं ।
छल - परपंच , भय , आशंका , अविश्वास
नया जीवन ना जाने कैसा हो ??
वह पुरूष जो वेदी की परिक्रमा करके
सात वचन भरके
जीवन भर के लिये जुड़ जायेगा
क्या जीवन भर सुख भी दे पायेगा ??
विवाह संस्था देती हैं अधिकार
क्या उसके साथ कर्तव्य भी जुड़ पायेगा ??
इसी चिंतन - मनन में
स्वीकार कर लेती हैं
अपना एकाकीपन ।
वे समर्थ हैं , किसी के आगे किसी के साथ
समझोता क्यों करे ??

क्षणिकायें ---------- ११

लोग अब कहने लगे हैं
जिन्दगी जी ली बहुत
डोर कठपुतली की जाने
कब कटेगी दोस्तों ।

Monday, June 30, 2008

क्षणिकायें ---------- १०

मन करता हैं
बिन बजाये जो बजती
तुम्हारी वह बांसुरी सुनु
और बस डूब जाऊं उसमे
बिना ध्वनि के
जो ब्रम्हांड से उत्तर कर
सहस्त्रार मे झरती हैं ।
अनहद नाद के रूप मे ।

Monday, June 23, 2008

क्षणिकायें ---------- ९

जब देखती हूँ
पत्थर का कलेजा फाड़ कर
हरी हरी दूब लहरा रही हैं
मुझे लगता हैं
अभी प्रेम मरा नहीं
कहीं भीतर से निकलेगा
और उसका रंग हरा होगा

Saturday, June 21, 2008

माँ की कामना

धरती हैं माँ , पृथ्वी हैं माँ
सबके पेरो के नीचे हैं माँ ।
देखती हैं , सुनती हैं , सहती हैं
कोई धीरे धीरे चलता हैं
कोई धम - धम चलता हैं
कोई थूकता है , कोई गाली देता हैं
कोई कूड़ा गिराता है
कोई पानी डालता हैं
सभी बच्चे हैं उसके
माँ पृथ्वी कुछ नहीं कहती ।
कहे भी किससे ? और क्या कहे ?
जन्म दिया हैं जिनको
उनसे कैसे बदला ले ?
कैसे दंड दे ?
उसे तो क्षमा करना हैं , क्षमा - बस क्षमा
वहीं उसका सुख हैं ,
वही उसकी सफलता ।
उसके बच्चे कही भी , कैसे भी जाये
उसकी छाती पर चढ़ कर
बस आगे बढ़ कर यही उसकी कामना हैं ।

Friday, June 20, 2008

चाहना

चाहना और कह पाना
दोनों मे हैं अन्तर ।
मैने कब कहा
तुम मेरे साथ रहो
पर चाहा जरुर ।
मैने कब कहा
तुम मेरा दर्द सहो
पर चाहा जरुर ।
मैने कब कहा
मेरे शब्दों के सन्दर्भ तुम समझो
पर चाहा जरुर ।
कहने और चाहने मे अन्तर हैं
कहना अर्थ रखता हैं
और चाहना
मन के अंदर
घुटकर प्रतीक्षा करता हैं

Wednesday, June 18, 2008

क्षणिकायें ----------८

उम्मीद हैं एक साया
कब शाम हो
और साथ छुट जाए ।

Tuesday, June 17, 2008

क्षणिकायें ----------७

सपने हैं रेत के महल
वक़्त की लहरे
बहा ले जायेगी

जीवन

जीवन क्या हें ??
जाडो की धुप
फूलों का रूप
लहरों का गीत
सपनो का मीत
भादो का मेघ
यौवन का वेग
रसना का स्वाद
तन का श्रृंगार
प्रियतम की पाती
ममता का बन्धन
कर्म का पछतावा
काया की भटकन ?
बस बस और नहीं
क्योकि
जीवन परिभाषा का मोहताज नहीं

Monday, June 16, 2008

मील का पत्थर

कोरे कागज़ पर उतरने को
कुलबुलाते हैं अक्षर ।
कहते हैं ,
उम्र का बीता हुआ हर वर्ष
जिन्दगी के सफर का
एक मील पत्थर हैं ।
न जाने कौन सा पत्थर होगा
जिसके आगे , और पत्थर नहीं होगे ।

Friday, June 13, 2008

क्षणिकायें ----------६

क्या अजब यह जिन्दगी हैं
हम जहाँ होते है ख़ुद भी
हम वहाँ होते नहीं
आंसूं बहना चाहते हैं
रास्ता पाते नहीं ।

क्षणिकायें ----------५

जिन्दगी ये क्या किया तूने
ज़हर किश्तों मे
क्यों मुझे दिया तूने

Thursday, June 12, 2008

क्षणिकायें ----------४

गुलाब की बात
मत करो
क्यारी के शेष फूल
उदास हो जायेगे

Wednesday, June 11, 2008

असली रूप

कौन सा हैं असली रूप
दर्पण के सामने
खडे हो कर
देखा हैं कई बार ।
स्नानगृह का रूप ,
शयनकक्ष का रूप.
सभामंच का रूप ,
कार्यालय का रूप ,
सड़क का रूप ,
अस्पताल का रूप ,
मन्दिर का रूप ,
एक ही चेहरा
दिखता हैं दर्पण में
पर रूप
हर बार बदल जाता हैं ।
भीतर का निराकार
बाहर का साकार
चेहरे के हर कोण में
परिवर्तन बनकर
दिखता हैं दर्पण में

Tuesday, June 10, 2008

क्षणिकायें ----------३

रिश्ते हैं काँच के खिलौने
गलतफहमी के पत्थर
चूर चूर कर देंगे उन्हे ।

क्षणिकायें ----------२

प्रसंग और सन्दर्भ
बदलते हैं
पर क्या जरुरी है
हम - तुम भी उनके साथ
बदल जायें

हाइकू १ / क्षणिकायें ----------१

जिन्दगी की शाख से
जिन्दगी उड़ गयी
टूटे पत्ते की तरह

अधूरी जिन्दगी

राम बिना सीता
कृष्ण बिना रुक्मिणी
गौतम बिना अहल्या
दुष्यंत बिना शकुंतला
भोगती रही अपनी क्रूर नियती
जी ली उन्होने अधूरी जिन्दगी
तब तुम्हारे बिना मै
क्या जी नहीं सकती
अपनी जिन्दगी ?


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Monday, June 9, 2008

हस्ताक्षर

मटमैले झुरिँयोदार
कागजी - चेहरे पर
समय ने लिखा
" विगत से मत जोडो , आगत की चिंता छोडो
वर्तमान मे जियो
इस क्षण को भोगो "
पढ़ा , समझा और
मैने हस्ताक्षर कर दिये ।


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