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हर पाठक और हर टिपण्णी प्रेषक का मै धन्यवाद करती हूँ । ख़ुद कंप्यूटर पर नहीं काम करती हूँ इस लिये आपको जवाब नहीं दे पाती हूँ पर आप की हर टिपण्णी को पढ़ती जरुर हूँ . डॉ मंजुलता सिंह
Monday, June 30, 2008
क्षणिकायें ---------- १०
मन करता हैं बिन बजाये जो बजती तुम्हारी वह बांसुरी सुनु और बस डूब जाऊं उसमे बिना ध्वनि के
6 comments:
बिना ध्वनि के जो ब्रम्हांड से उत्तर कर सहस्त्रार मे झरती हैं ।अनहद नाद के रूप मे ।
बहुत सुंदर पंक्तियाँ है यह
bahut khubsurat basuri ki hi tarah mithi.
bhut khub. likhate rhe.
बहुत बढ़िया, बधाई.
aur woh gaan sunayee de.. jo..mujhe Ishwar ko paane me, samajhane me madad kare aur ekaakaar kar de..
good, aapki books kaha milegi?
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