ALL POST ARE COPY RIGHTED . COPYING WILL MEAN LEGAL PENALIZATION .
SPELLING ERRORS ARE DUE TO TYPING
हर पाठक और हर टिपण्णी प्रेषक का मै धन्यवाद करती हूँ । ख़ुद कंप्यूटर पर नहीं काम करती हूँ इस लिये आपको जवाब नहीं दे पाती हूँ पर आप की हर टिपण्णी को पढ़ती जरुर हूँ .
डॉ मंजुलता सिंह

Friday, July 4, 2008

अविवाहित बेटियाँ

माँ का सपना होता हैं
उस दिन से
जब वह बेटी को जनम देती हैं ।
उसकी प्यारी गुड़िया
सजे , संवरे , बड़े होकर दुलहन बने
उसके घर बारात आए
और उसकी बेटी रानी बन कर बाबुल का घर छोडे ।
पर हर माँ का सपना पूरा नहीं होता
आज योग्य बेटियाँ
विवाह - बंधन मे बंधना नहीं चाहती ।
विवाह संस्था मे उनका विशवास नहीं ।
छल - परपंच , भय , आशंका , अविश्वास
नया जीवन ना जाने कैसा हो ??
वह पुरूष जो वेदी की परिक्रमा करके
सात वचन भरके
जीवन भर के लिये जुड़ जायेगा
क्या जीवन भर सुख भी दे पायेगा ??
विवाह संस्था देती हैं अधिकार
क्या उसके साथ कर्तव्य भी जुड़ पायेगा ??
इसी चिंतन - मनन में
स्वीकार कर लेती हैं
अपना एकाकीपन ।
वे समर्थ हैं , किसी के आगे किसी के साथ
समझोता क्यों करे ??

10 comments:

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

अच्छा भाव है लेकिन बेटी पैदा होते ही हम उसे दुल्हन बनाने का सपना ही क्यों देखने लगते हैं? सपने बदलने होंगे। हमें उनके लिए भी वही सपने देखने होंगे, जो हम बेटों के लिए देखते हैं। उन्हें कुछ बनाने का सपना....डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार या जो वो बनना चाहें। यही बेटियों के हित में है

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

अच्छा भाव है लेकिन बेटी पैदा होते ही हम उसे दुल्हन बनाने का सपना ही क्यों देखने लगते हैं? सपने बदलने होंगे। हमें उनके लिए भी वही सपने देखने होंगे, जो हम बेटों के लिए देखते हैं। उन्हें कुछ बनाने का सपना....डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार या जो वो बनना चाहें। यही बेटियों के हित में है

रंजू ranju said...

अब सपना बदल रहा है ..कि वह पहले अपने पांव पर खड़ी हो जाए ताकि सही में समर्थ हो सके ..पर यह चिंता तो है ही साथ साथ
अच्छी कविता है

रंजना said...

आपने वर्तमान का यथार्थ लिखा है.मेरा अनुभव रहा है कि केवल आर्थिक रूप से समर्थ लड़कियां ही नही लड़के भी विवाह को दांपत्य बंधन नही बल्कि एक ऐसा बंधन जो एक बोझ से अधिक कुछ भी नही,मानने लगे हैं.कारण और परिणाम पर चर्चा छेडी जाए तो बहुत लम्बी हो जायेगी. यहाँ आपके रचना के बारे में यह कह सकती हूँ कि बहुत ही सुंदर लिखा है आपने.एक आम माता का सपना अब भी यही है.पर समय के साथ साथ यह परिमार्जित भी होता जा रहा है.अब सामान्य पढ़े लिखे परिवारों में भी पुत्री को पढ़ा लिखा कर आत्मनिर्भर बना पाने की भावना तेजी से विकसित होती जा रही है.

राज भाटिय़ा said...

आप की कविता काफ़ी हद तक अच्छी हे,आप मेरी मां समान हे, लेकिन आप से अगर मे यही सवाल पुछु लेकिन आप के सवाज के जवाव मे तो आप का क्या जवाव होगा ?
जीवन भर के लिये जुड़ जायेगा
क्या जीवन भर सुख भी दे पायेगा ??
बस यही सवाल हे मेरा फ़र्क बस इतना हे
**जीवन भर के लिये जुड़ जायेगी
**क्या जीवन भर सुख भी दे पायेगी ??
माता जी अगर बुरा लगे तो नलायक समझ कर माफ़ करे, मेरी टिपण्णी हमेशा सच्ची के करीब होती हे.बेटे की मां भी तो ऎसा ही सोचती होगी या नही ? कया बेटे ही खारब होते हे??? बेटिया नही???

राज भाटिय़ा said...

आप की कविता काफ़ी हद तक अच्छी हे,आप मेरी मां समान हे, लेकिन आप से अगर मे यही सवाल पुछु लेकिन आप के सवाज के जवाव मे तो आप का क्या जवाव होगा ?
जीवन भर के लिये जुड़ जायेगा
क्या जीवन भर सुख भी दे पायेगा ??
बस यही सवाल हे मेरा फ़र्क बस इतना हे
**जीवन भर के लिये जुड़ जायेगी
**क्या जीवन भर सुख भी दे पायेगी ??
माता जी अगर बुरा लगे तो नलायक समझ कर माफ़ करे, मेरी टिपण्णी हमेशा सच्ची के करीब होती हे.बेटे की मां भी तो ऎसा ही सोचती होगी या नही ? कया बेटे ही खारब होते हे??? बेटिया नही???

DR.ANURAG said...

सत्येन जी बात से सहमत हूँ....वाजिब प्रशन है....

Advocate Rashmi saurana said...

bilkul sahi prashan rakkha hai aapne. sundar rachana ke liye badhai.

Kavi Kulwant said...

I asked a similar question to someone.. few seconds ago...
I got the reply from your this poem...

Kavi Kulwant said...

striyan to sambhavtah.. puri tarah se jud bhi zaati hain.. samarpit bhi kar deti hai.. purush hi adhik chanchalta dikhate hain..