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डॉ मंजुलता सिंह

Monday, July 7, 2008

गर्भपात


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2 comments:

रंजना said...

गर्भपात /भ्रून्हत्या / खोख में ही उस अजन्मे को मौत के घाट उतारना चाहे बालक हो या बालिका,घोर निंदनीय कर्म है,जो अब इतनी आम हो गई है कि इस हेतु उत्सुक माताएँ(कुंआरी या ब्याहता)इसे ब्यूटी पार्लर जा बाल कटवाने या आइब्रो बनवाने से ज्यादा अहमियत नही देतीं. .संवेदनाएं कहाँ गयीं कुछ समझ नही पड़ता.अपने आस पास कईयों के सामने तो मैंने स्वयं रो रोकर अपने अन्दर पल रहे उस नन्हे शिशु को महसूस करने उसे जीवन दान देने की गुहार लगायी है पर सबकुछ बिल्कुल ही बेअसर देखा है.
आपने जो कहा है वह भी सही है.हर स्त्री ऐसी नही होती बहुतों को यह कार्य मजबूरी में करना पड़ता है,पर मुझे लगता है नारी/माँ कितनी भी किसी भी परिस्थितिवस मजबूर क्यों न हो यदि वह न चाहे तो बलात कोई उसका गर्भपात नही करवा सकता.और न ही इसके लिए हम पुरूष को पूर्ण दोष दे सकते हैं क्योंकि यदि घर परिवार में बालिका के बदले बालक की मांग का माहौल बनता भी है तो वह अक्सर महिलाओं द्वारा ही बनाया जाता है चाहे उसे आप सास ननद या जो भी कहें.चाहे सास हों ननद हों या कोई और ,ये भी तो नारियां ही होती हैं जो यदि बहू कन्या को जन्म दे दे तो उसके लिए उसे प्रताडित करती हैं.
मैंने तो बहुधा आजकल फैसन में देखा है कि स्त्रियाँ यदि पहली संतान बेटी हो जाए तो दूसरे संतान के रूप में बेटा पाने के लिए भ्रूण परिक्षण करवाती हैं और कई कई गर्भपात कराती हैं.
जब व्यक्ति में संवेदनाएं गौण होने लगे तो सख्ती से इसके उन्मूलन हेतु नियम बनाकर तथा सामाजिक अभियान चलाकर इसे घृणित बताकर ही इसपर कुछ लगाम लगाया जा सकता है.

swati said...

ऐसा भी होता है की मजबूरी -वश यह कर्म करना भी पड़ता है.....यह जानते हुए कि यह ग़लत है.....यह भी मान लेना चाहिए.....कोई भी माँ ऐसा कर्म ह्रदय से नहीं करती...ऐसी माँ पर क्या गुजरती है वो कोई चाहे भी तो नहीं समझ सकता...वेदना का सागर बहता रहता है गर्भ में आजीवन..